टीम ARTIA का सुझाव, मास्टर प्लान के अनुसार हो औद्योगिक विकास

जयपुर। अखिल राज्य ट्रेड एंड इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (आरतिया) ने सुझाया है कि राजस्थान में सरकार ने मास्टर प्लान में जो भूमि औद्योगिक व व्यवसायिक विकास के लिए चिन्हित की है, उसे ही प्रांत के औद्योगिक विकास का आधार बनाया जाए। मास्टर प्लान समेकित हो और इसमें एकरूपता हो तथा ऐसा हो ताकि दीर्घकालिक बदलाव न हो। मास्टर प्लान में जो भूमि औद्योगिक-व्यवसायिक स्वरूप वाली है, केवल वहीं पर औद्योगिक क्षेत्र विकास तथा व्यवसायिक गतिविधियां संचालित हों। ऐसे क्षेत्र में भू उपयोग परिवर्तन की आवश्यकता भी नहीं रहनी चाहिए, क्योंकि जब सरकार मास्टर प्लान में भू-उपयोग सुनिश्चित कर चुकी है, तो ऐसी भूमि का तदनुसार उपयोग करने वाले उपयोगकर्ता पर भू-उपयोग परिवर्तन की बाध्यता न रहे।

राजस्थान में ईज आफ डूईंग बिजनेस प्रोसेस को सहज एवं प्रभावी कैसे बनाया जाए, इस पर टीम आरतिया की एक उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की गई। बैठक में विष्णु भूत, कमल कंदोई, आशीष सर्राफ, जसवंत मील, प्रेम बियाणी, अजय गुप्ता, ज्ञान प्रकाश, ओ पी राजपुरोहित, कैलाश शर्मा, सज्जन सिंह, संजय पाराशर, राजीव सिंहल, तरूण सारडा, सुनील बंसल, दिनेश गुप्ता, डॉ रवि गोयल, तिरूपति कंदोई, सुरेश बंसल तथा आयुष जैन उपस्थित थे। सभी से मिले इनपुट के आधार पर टीम आरतिया ने ईज आफ डूईंग बिजनेस के लिए व्यवहारिक रोड़मैप बनाया है। इस रोड़ मैप पर आधारित एक ज्ञापन केंद्र सरकार कैबिनेट सचिवालय से आये सचिव मनोज गोविल को आरतिया की ओर से अजय गुप्ता और आयुष जैन ने सौंपा।

टीम आरतिया ने ज्ञापन में रेगुलेशन रिफार्म पर फोकस करते हुए अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिए। पहला सुझाव फायर फाईटिंग सिस्टम के विनियमन को लेकर था, जिसके लिए बताया गया कि वर्तमान में औद्योगिक इकाइयों का संचालन प्रारंभ करने से पूर्व संबंधित नगर निकाय या स्थानीय एजेंसी से एनओसी लेना अनिवार्य किया हुआ है, जिसकी पालना में 20 हजार लीटर से दो लाख लीटर क्षमता वाली पानी की टंकी रखना अनिवार्य है। आरतिया के अनुसार अब औद्योगिक स्वरूप में बड़ा बदलाव आया है और नये तरह के फायर फाईटिंग सिस्टम आ गये, जो तत्काल प्रभावी भी हैं। ऐसे सिस्टम लगाने पर भी उद्योग को सुरक्षित किया जा सकता है। इस कानून में तत्काल व्यवहारिक बदलाव की आवश्यकता है।

इसी तरह आरतिया ने कहा है कि पर्यावरण विभाग की एन ओ सी के आनलाइन आवेदन होता है और फिर बहुत मशक्कत के बाद वह मिलती है। हर उद्योग का पर्यावरण नजरिए से अपना प्रोटोकॉल होता है, उस प्रोटोकॉल की पालना के लिए उद्योग आवश्यकता अनुसार उपकरण सुनिश्चित होते हैं, जिन्हें लगाने की सूचना पर्यावरण विभाग को दिए जाने के बाद अधिकतम दस दिन में पर्यावरणीय स्वीकृति सुनिश्चित की जाये। इससे उद्यमी का समय बचेगा और औद्योगिक इकाइयों का परिचालन शीघ्र प्रारंभ हो सकेगा।

टीम आरतिया का एक महत्वपूर्ण सुझाव यह भी है कि जो कारोबारी उद्यम योजना के तहत पंजीकृत है, उसे फिर शाप एक्ट के तहत लाईसेंस लेने की अनिवार्यता से मुक्त किया जाए। इसलिए कि जो उद्यम क्रमांक ले लेता है, उसका जीएसटी नंबर, पैन नंबर, आधार नंबर तथा व्यक्तिगत जानकारी उद्यम पोर्टल के जरिए सरकारी तंत्र के पास आ जाती है, अतः अलग से स्थानीय निकाय से लाईसेंस लेने की अनिवार्यता समाप्त हो।

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